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ओशो, मैं और तुम


उसने हमेशा मेरे द्वारा तकलीफ देने पर यही कहा कि "आग में जलकर ही सोना कुंदन बनता है" मैं इसका मतलब नहीं समझ पाई। पर आज जैसे ही मैंने ओशो को अपने हाथों में लिया एक अजीब सा अहसास था, ऐसा लगा कोई चीज़ जो मुझतक पहुंचने को बेकरार थी आज मुझे मिल गई उसे खोलने पर मुझे तुम्‍हारा चेहरा ही नज़र आया ऐसा लग रहा था मैं तुम्‍हें ही पढ़ रहीं हूँ, हर शब्‍द में तुम्‍हारी मौजूदगी, हर शब्‍द तुम्‍हारा आइना लग रहा था जो मुझे प्‍यार, भगवान और हम दोनों में एक जैसा होने की बात कह रहा था।
मैंने ओशो को पूरा नहीं पढ़ा पर जितने भी पन्‍ने मैंने पढ़े उनसे यही जाना कि प्‍यार मौत से पहले मरने का नाम है, प्‍यार किसी के लिए खुद को समर्पित कर देने का नाम है, प्‍यार किसी के प्रति वो दीवानगी है जिसमें आप खो जाते है जैसे राधा खोई थी कृष्‍ण के प्‍यार में जैसे कोई भगवान को पा लेता है।
जब तक मैं पढ़ती रहीं उन शब्‍दों में मुझे हमारा ही अक्‍स नज़र आया ऐसा लगा जैसे मैं खुली आंखों से कोई सपना देख रहीं हूँ जिसमें तुम मुझे प्‍यार का मतलब बता रहे हो और मैं बस तुम मे खोती जा रहीं हूं.....
प्‍यार भी यही है न जब हम किसी दूसरे में पूरी तरह से भगवान की भक्ति की तरह लीन हो जाते है??
मेरा मन भटकता रहता था उन रास्‍तों में जिसकी कोई मंजिल ही नहीं थी! मैं हमेशा सोचती थी जो हम सह रहें है, जो हमारे साथ हो रहा है, इतना दर्द, दुख, आंसू जो हम सह रहें है उससे बाहर निकलकर कब खुश रह पाएंगे!!!
कितनी पागल थी मैं जो ये न जान पाई कि खुशी तो इसी में है जब हम दर्द सहते है एक दूसरे के लिए, रोते है एक दूसरे को तकलीफ़ में पाकर, डरते है एक दूसरे को दुख पहुँचाने में!
ओशो ने भी तो प्‍यार को पीड़ादाई कहां है, उसे एक आग कहा है जिसमें जलकर ही हमारी आत्‍मा पवित्र होती है....
हम यह सब सहते रहे और हमारा हर एक कदम उस भगवान की ओर चलते गए
आज मैंने तुम्‍हारे ज़रिये भगवान को पा लिया इससे बड़कर आज के दिन और कोई तोहफा मेरे लिए नहीं हो सकता कि आज मैं तुममे और तुम मुझमे हमेशा के लिए समा गए।

प्रतिक्रियाएँ

Re: ओशो, मैं और तुम
ओशो का बेबाक लेखन हर इमानदार शख्सियत को खुद का अक्स लगता है। चलिए एक और व्यक्ति ओशो के जरिए जीवन को उसकी सच्चाई को पहचान सका। ओशो हमेशा कहते है प्यार पाखंड नहीं। मौत सच्चाई है और प्यार करने के लिए स्वयं मौत से रूबरू होना होता है। अर्थात प्यार में इतना डूबना होता है कि व्यक्ति में मैं का भाव ही खत्म हो जाए। अहम जैसी अदन चीज उसकी जिंदगी में ही न हो। आप भी ओशो की किरणों के नजदीक गईं...पढ़कर अच्छा लगा।
Re: ओशो, मैं और तुम
ओशो को मैंने कभी नहीं पढ़ा पर आज जब आपके द्वारा लिखा लेख पढ़ने का अवसर मिला तो पता चला कि उन्होंने प्रेम के बारे में कितनी गहराई से लिखा होगा. आपका लेख वाकई प्रशंसनीय है. बधाइयाँ.
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