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प्रेम


ओशो को जब भी पढ़ा अंदर एक अजीब सी बेचैनी रहीं है...
हर बार एक नया सवाल और उसे पढ़ने, जवाब पा लेने के बाद फिर एक नए सवाल का जन्‍म?
खुद से हज़ारों सवाल करने और परेशान होने के बाद जब मैंने कल ओशो पढ़ा तो सिर्फ एक ही जवाब मिला कि जो बेचैनी, अकेलेपन में सुकुन का एहसास, भीड़ में हर शख्स में उसका चेहरा दिखाई देना कोई पागलपन नहीं बल्कि उस भगवान को पा लेने का संकेत है जिसे पाने के लिए लोगों को कई सालों तक तपस्‍या करनी पड़ती है।
प्‍यार का एहसास शायद ऐसा ही होता है जहां आप किसी और के साथ हो, पर अंदर सिर्फ़ उसका स्‍पर्श, मौजूदगी में वहीं होता है। हँसने में, रोने में, पेड़-पौधे में, पानी में हवा में खुले अंबर पर बस उसका ही अक्‍स नज़र आता है। ऐसा लगता है जैसे रात से जागने के बाद सुबह जब खिड़की से बाहर झांका तो खुला आकाश था उसकी बांहों की तरह जो मुझे अपने पास बुला रहा है।
वो मेरे लिए भगवान की तरह ही है....
हमारा रिश्‍ता कितना पवित्र हो गया है जहां हमारे बीच एक मौन स्‍वीकृति ने स्‍थान ले लिया है न उसे कुछ कहने की
जरूरत है न मुझे, न उसे मेरे करीब आने की जरूरत होती है न ही उसे। एक पवित्र रिश्‍ता है हमारा जहां होंठों को कहने या हाथों को छूने की जरूरत नहीं होती उसकी नज़रें सीधे मेरी रूह तक पहुँचती है... हमारे बीच सबकुछ एक सा है हमारा हंसना, रोना, प्‍यार करना, देखना सब कुछ एक सा शायद किसी ने सच ही कहा है प्‍यार में लोग दो होते है पर उनकी आत्‍मा एक हो जाती है। कितनी प्‍यारी दुनिया है हमारी जहां हम दोनों खोकर सिर्फ भगवान को पाते है।


प्रतिक्रियाएँ

Re: प्रेम
ओशो को पढ़ो या कबीर को बस तुम ख़ुश रहो मेरी तो बस यही ख्‍़वाहिश है. बहरहाल अच्छा लिखा है. :)
अस्वीकरण