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बातें कुछ अनकही-सी


कितनी अनकही बातें थी हमारी या फिर सिर्फ़ मैं ही कहती रही…..
हमारे रिश्‍ते की शुरूआत से लेकर अंत तक हमारे प्‍यार की कहानी में सिर्फ मेरे ही संवाद रहे। जैसे मैं बस खुद से ही बातें करती रही, खुद से प्‍यार करती रही जैसे अक्‍सर बच्‍चे करते है गुड्डे गुड़िय़ों के खेल में खुद ही बोलना, फिर किसी बात पर नाराज़ हो जाना और थोड़ी देर बाद खुद में ही कुछ कह कर खुश हो जाना।
मैंने जो कह दिया उसने मान लिया, बात प्‍यार की हो, साथ रहने की, लड़ने की हो या फिर अपने एहसास, जज़्बात को जताने की…..
सिर्फ मैं ही मैं बोलती रही उसने कुछ भी नहीं कहा शायद इसलिए क्‍योंकि पहली बार उसकी जिंदगी में कोई ऐसा आया था जो उसे उसी से छिनना चाहता था, उसे भीड़ में सबसे अलग बनाना चाहता था।
जितने भी समय हम साथ रहें वो बस यही कहता रहा कि तुमने एक आम इंसान का खास बना दिया है जिसकी उसे कभी आदत नहीं थी।
हमारे बीच होने वाले हर अधूरे संवाद को आज पूरा करने का मौका मिल ही गया
मैं उससे अपनी हर बात के लिए माफी मांग रहीं थी क्‍योंकि मैं अपनी एक नई दुनिया की शुरूआत करने जा रही थी, जिसमें मेरे अलावा शायद कोई नहीं आ सकता। मैंने उससे अपने प्‍यार, नाराजगी, जिद और जितनी भी तकलीफ़ें मैंने उसे दी है हर बात की माफ़ी मांग ली इस उम्मीद से की वो मुझ पर नाराज़ जरूर होगा और अपने दर्द का थोड़ा सा हिस्‍सा मुझे दे देगा। पर उसने उन आखिरी पलों में भी यही कहा “क्‍या कहूँ मैं, सब तो आप ही कह रही हैं… जो कहा मान लिया बस। हाँ हमारे रिश्‍ते में गलती जरूर हुई है, पर किसकी वजह से पता नहीं...
मैं आज भी तुम्‍हे पसंद करता हूँ पर कुछ बातें जो मैं कभी बताना और समझाना चाह रहा था वह शायद सही रूप में पहुँच नहीं पाईं उस पार तक!!

इस बात ने शायद फिर से एक नया रिश्‍ता बना दिया था हमारे बीच… अब भले ही इस रिश्‍ते में प्‍यार की जगह न हो, पर हमारा रिश्‍ता एक ऐसा रिश्‍ता जरूर बन गया है जिसने हमारी अनकही बातों को शब्‍द दे दिए।

अस्वीकरण