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22 अप्रैल, 2008


ब्लॉग्स (1)
डर नहीं है दुनिया का उसकी बाँहों में टूट के बिखर जाना चाहती हूँउस खुदा से लिपट कर खुदा हो जाना चाहती हूँक्‍या नशा है नहीं जानती, बस कहीं दूर बह जाना चाहती हूँ............ये कुछ लफ्ज़ हैं जो कल रात घर में बिखरे सामान की तरह फर्श पर बिखरे मिले, सुबह उठकर ... आगे पढ़ें...