भावनाओं को चाहिए
अभिव्यक्ति लेकिन
हम चुप रहते है, कि
बिना कहे वे समझ
ली जाएगी, लेकिन
वे रह जाती है अनसुनी
क्योंकि कहने और सुनने
के बीच
“मौन” बस ठिठका
खड़ा रहता है।
यहाँ से वहाँ तक बहता नहीं है
बेहतर है कुछ इस तरह
जी जाएं अपनी बात को
ऐसे शब्द दे दिए जाए कि
जब समय लिखने बैठे
इतिहास तो लगे हमारे
बिना जिंदगी की कहानी
मुकम्मल पूरी होगी नहीं कभी!!
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