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सफ़र


आज का दिन ऐसा है जैसे वो हर पल मेरे साथ भी था, और मीलों दूर भी
उसका साथ चलना मेरी जरूरत भी था, और खुद की तन्‍हाई मेरी मर्जी भी
उसकी हंसी दिल सुकून भी था, और दिल में उठते हज़ारों सवालों का सबब भी
उसकी आंखें शांत समुद्र भी थी, और आने वाले किसी तूफान का ईशारा भी
उसकी बातों में कहीं एक मंज़िल भी थी, और कहीं सूनी सी लंबी तन्‍हा सड़क भी
उसका स्‍पर्श सवालों का जवाब भी था, और अंदर तक उतर जाने वाली चुभन भी
उसका मेरे साथ होना मेरा ख्‍याल भी था, और मेरे ख़्यालों पर उसे एतबार भी
उसको प्‍यार करना खुशकिस्‍मती भी थी, और प्‍यार को दर्द में पिरोने की मेरी जुस्तजू भी।।

प्रतिक्रियाएँ

Re: सफ़र
सफर था बिना हम्सफर तभि तो सवाल था आप माने तो करोडो का सवाल था नहीं तो यह बद‍नसीब अकेला इंसान था
Re: सफ़र
आप एक नाजुक रिश्ते के प्रेम, लगाव-अलगाव और उसकी खूबी और विडंबना को काव्यात्मक संवेदनाअों के साथ पकड़ने की खूबसूरत कोशिश कर रही हैं। एक तरफ यह कविता या काव्यात्मक गद्य तुकबंदी से मुक्त है तो दूसरी तरफ नकली मुद्राअों-भंगिमाअों से भी मुक्त है। इसमें अपने को अभिव्यक्त करने के लिए एक नई जमीन की तलाश भी है और अपने को समझने की एक विनम्रता भी। न पकड़ में आने वाली अपनी भावना्ों को खूबसूरत शब्दों का लिबास पहनाने का जतन भी इसमें दिखाई देता है। इस तरह की अभिव्यक्तियां कई बार गद्य और पद्य के बीच नकली विभाजक रेखा को मिटा देती हैं और हमें एक नई विधा का आस्वाद देती हैं। हिंदी में इधर कुछ कवियों ने इस नई जमीन पर बेहतरीन कविता या गद्य काव्य लिखा है।
Re: सफ़र
:)
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