कहने को तो कहा जाता है कि बच्चों पर अत्याचार करना अपराध है, और देखा भी जाएं तो प्रत्यक्ष रूप से तो कोई भी बच्चों से कार्य भी नहीं करवाता या करवाएगा। बाल श्रम पर रोक जो लगाई गई है और एक दो हफ़्ते में तो पुलिस और मीडिया द्वारा इस पर आवाज़ भी उठाई जाती रहती है। कुछ शहरों या जगह पर पुलिस वालों के भय से बच्चों पर अत्याचार करने से लोग डरने लगे हो परंतु जब स्वयं पुलिस उनपर अत्याचार करें तो फिर क्या किया जाए या कौन जिम्मेदारी लेगा उनके इस तरह के कार्यो की जिसमे समझ में ही नहीं आता ये कानून के रखवाले है या कानून को इन्होंने रखा हुआ है।
कल अख़बार में एक खबर थी कि सुरत (गुजरात) में 13 से 15 वर्ष की उम्र के बच्चों को पुलिस स्टेशन में बिजली के झटके दिए गए जिससे उनके शरीर पर काले और नीले निशान दिखाई पड़ गए जो उनके ऊपर हुए जुल्म की कहानी का बयां कर रहें थे।
क्यों?
इसका कारण था कि उन बच्चों ने पैसे चुराए थे और उनके द्वारा यह बात कबुल नहीं करने पर पुलिस वालों उनके साथ यह तरीका अपनाया। कानून में प्रावधान है कि नाबालिग अपराधी बच्चों को बाल सुधार गृह में भेजा जाएं जहां उन्हें सुधारा जाएं। इस तरह की घटना से दो बातें सामने आती है पहली कि या तो पुलिस वालों को इतना मानसिक तनाव है कि वे अपनी नीजि परेशानीयों को इन छोटे-छोटे बच्चों पर उतारने लगे है या दूसरा कि वे अब अदालत के कानून को कुछ समझते ही नहीं, और अपने तरीके से बच्चों को सुधारने की कोशिश करने लगे है। यह पहली घटना नहीं कि बच्चों के साथ इतना अत्याचार किया गया है कई जगह बच्चों को कई दिनों तक भूखा प्यासा और निवृस्त्र रखकर पताडि़त किया जाता है। सिर्फ यहीं क्यों निठारी कांड से लेकर किसी चाय की दुकान या बड़ें शोरूम में बच्चों के साथ हो रहे अत्याचार, स्कूल बस में बच्चों को भेजने का डर, उनके घर जल्दी न आने की चिंता आखिर हम कब तक सहते रहेंगे।
पहले हम कानून के भरोसे रहते थे कि अब यह घटनाएँ रूक जाएंगी पर इसकी तरह ही कितनी ही दर्दनाक घटनाएँ बच्चों के साथ हो रही है तो ऐसी कानून व्यवस्था पर कौन विश्वास करेगा?
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