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17 मई, 2008


ब्लॉग्स (1)
जाने क्‍या था उस समय मेंहर बात उलझती जाती थीजिस डोर को सुलझाना चाहा थावो बीच से कही टूट कर बिखर गईकल रात भी….जिंदगी और मौत के साक्षात्‍कार मेंमौत न जाने कब जिंदगी से जीत गईएक जिस्‍म था जिनका मुद्दामौत न जाने कब उसे जीत कर ले गईएक कतरा था ज़मीन पर आंसू का ... आगे पढ़ें...