जाने क्या था उस समय में
हर बात उलझती जाती थी
जिस डोर को सुलझाना चाहा था
वो बीच से कही टूट कर बिखर गई
कल रात भी….
जिंदगी और मौत के साक्षात्कार में
मौत न जाने कब जिंदगी से जीत गई
एक जिस्म था जिनका मुद्दा
मौत न जाने कब उसे जीत कर ले गई
एक कतरा था ज़मीन पर आंसू का कही
शायद उसके पैरों ने उसे सोख लिया था
रूह भी आसमां तक जा न सकी उसकी
बीच में कहीं अंधेरा उसे लील गया था
आखरी पलों में जाते समय भी
शायद कुछ अधूरा सा कही कुछ रह गया था!!!
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