मैंने हर बार कहा हम जहां है खुश है
पर शायद वक्त इस बात को मानना ही नहीं चाहता था
बार बार यही सवाल हम एक दूसरे से करते रहे
दो बच्चों की तरह हम भी वक्त को सिर्फ
आधे आधे हिस्से में बाँटते रहें और अपनी सफ़ाई पेश करते रहें
जिन बातों को तब मैंने बहुत गहरा कहा था
आज मुझ से सुनकर उसने कह दिया मैं भी तो यही कहता था तब
मैंने उसे जब कहा कि
वक्त के काले बादल अब मुझ पर बरस गए है
जो भी दिल में था सब कह दिया
हमारे बीच जो कुछ भी था सब खत्म हो गया है
बस हम अब जहां है खुश है।
मैं बार-बार कोशिश करती रही की वो मान जाएगा
और शायद हमारी कहानी खत्म हो जाएगी पर वो
शायद आज बहुत उदास था, ना छोड़ना चाहता था
ना साथ लेकर चलना चाहता था।
उसने मेरा खुशी के लिए दुआ करता हाथ तो देख लिया,
पर वो एक भी मन्नत पूरी न कर पाया और कहता रहा
हाथ बडाया था तो कुछ लेकर जाती
यूही खाली हाथ लौट कर मेरे ज़मीर को भी रुसवा होना पड़ा।
बस बातों बातों में हमने बीते कुछ महीनों को एक पारदर्शी धागे में पिरोकर उसे सपनो के संदूक में सहेजने की कोशिश ही की है। उसे किस बात का दुख था मैं भी नहीं जानती थी बस उसे समझाने की कोशिशें ही करती रही। वो शायद मुझ से लड़ना चाहता था या कुछ और ये सब तो अनसुलझी पहेली ही रहे, पर कुछ शब्द उसने मुझे दे दिए ताकि हमारी यादें हमेशा ताज़ा रहें!!
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