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जून 2008


ब्लॉग्स (6)


>इस जहान से, जिसकी मैं कभी हो न सकीजहाँ का ख्‍वाब कभी मैं देख न सकीजिसके असूलों पर कभी खरी उतर न सकीजिसके दर्द मे अपने आँसू बहा न सकीजिसकी ना पर,मैं टूट कर धरती में समा न सकीहाँ, मैं खुश हूँ अपने जहान में जहाँ मेरा आसमां तो है। आगे पढ़ें...

वो परी अपने साथ मुझेपानी की गहराइयों में कहींदूर तक ले जा रही थीउसके हाथ को थामकर मैंनीले जल में नीचे उतरती गईतभी कुछ गरम सा एहसास हुआमैंने आंखे खोली तो दूर समंदर मेंआग उबल रही थी कहींउस परी ने पास ले जाकर बतायाये वही आग है..जिसे तुमने अपने भीतर छुपा रखा ... आगे पढ़ें...

वो भी बैचेनी में लिपटी अजीब सी सुबह का आगाज़ थासूरज भी खुद को काले कंबल में लपेटा चुपचाप खड़ा थादूर कहीं चांद भी आंसमा से उस रोशनी को ताक रहा थागगन के तारे भी उस रोशनी के आगे फीके दिख रहे थेधरती पर कहीं दूर बहती हुई नदी ने अपने भीतरएक शमा को पानी की लौ से ... आगे पढ़ें...

सबकुछ मेरे आस पास ही थाऔर वो सब थे मेरे पास एकदम शांतअचानक महसूस हुआकोई मेरे अंदर कहीं से झांक रहा हैया दिख रहा था वो मुझे हर कहींआसमान मे, धरती पर, मेरे हाथों मेंमेरी पलकों पर, मुस्‍कुराते होंठो परबहते ऑसुओं में, दोस्‍तों में, अपनों मेंहर कही....फिर भी ... आगे पढ़ें...