सबकुछ मेरे आस पास ही था
और वो सब थे मेरे पास एकदम शांत
अचानक महसूस हुआ
कोई मेरे अंदर कहीं से झांक रहा है
या दिख रहा था वो मुझे हर कहीं
आसमान मे, धरती पर, मेरे हाथों में
मेरी पलकों पर, मुस्कुराते होंठो पर
बहते ऑसुओं में, दोस्तों में, अपनों में
हर कही....
फिर भी मैं अकेली थी
फिर दूर कहीं से उसने मुझे आवाज़ दी
मैं दौड़ कर उस दिशा में गई
पर मैं वहा भी तन्हा थी..
आकाश का रंग भी धीरे-धीर मेरे अंदर
कैद अंधेरे की तरह काला होने लगा था
चांद की चांदनी भी जैसे मुरझा गई
बहुत कुछ महसूस करने के बाद भी
खुद को मैंने हर जगह तन्हा पाया।
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