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तेरा इंतज़ार


सबकुछ मेरे आस पास ही था
और वो सब थे मेरे पास एकदम शांत
अचानक महसूस हुआ
कोई मेरे अंदर कहीं से झांक रहा है
या दिख रहा था वो मुझे हर कहीं
आसमान मे, धरती पर, मेरे हाथों में
मेरी पलकों पर, मुस्‍कुराते होंठो पर
बहते ऑसुओं में, दोस्‍तों में, अपनों में
हर कही....
फिर भी मैं अकेली थी
फिर दूर कहीं से उसने मुझे आवाज़ दी
मैं दौड़ कर उस दिशा में गई
पर मैं वहा भी तन्‍हा थी..

आकाश का रंग भी धीरे-धीर मेरे अंदर
कैद अंधेरे की तरह काला होने लगा था
चांद की चांदनी भी जैसे मुरझा गई
बहुत कुछ महसूस करने के बाद भी
खुद को मैंने हर जगह तन्‍हा पाया।

प्रतिक्रियाएँ

Re: तेरा इंजज़ार
तन्हाई या अकेलापन हमेशा बुरा नहीं होता। अकेलापन हमें वह मौका देता हैं जहां हम चुपचाप थोड़ी देर बैठकर अपने दुःख को, अपने अवसाद को, अपनी टूटन को गहरे समझ-बूझ सकते हैं। उन्हें जान सकते हैं कि वे किन रेशों और रंगों से बनते हैं। इस तरह हमें अपने दुःख की बनावट और बुनावट को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं। बस उसे देखने की समझने-बूझने की एक नजर चाहिए।
Re: तेरा इंतज़ार
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