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5 जून, 2008


ब्लॉग्स (1)
वो भी बैचेनी में लिपटी अजीब सी सुबह का आगाज़ थासूरज भी खुद को काले कंबल में लपेटा चुपचाप खड़ा थादूर कहीं चांद भी आंसमा से उस रोशनी को ताक रहा थागगन के तारे भी उस रोशनी के आगे फीके दिख रहे थेधरती पर कहीं दूर बहती हुई नदी ने अपने भीतरएक शमा को पानी की लौ से ... आगे पढ़ें...