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शमा

















वो भी बैचेनी में लिपटी अजीब सी सुबह का आगाज़ था
सूरज भी खुद को काले कंबल में लपेटा चुपचाप खड़ा था
दूर कहीं चांद भी आंसमा से उस रोशनी को ताक रहा था
गगन के तारे भी उस रोशनी के आगे फीके दिख रहे थे
धरती पर कहीं दूर बहती हुई नदी ने अपने भीतर
एक शमा को पानी की लौ से जला रखा था
पिघलते मोम से रिसता पानी जहां भी गिरता गया
वो उस ज़मीन को तेरी ख्‍वाहिशों से भरता गया।

प्रतिक्रियाएँ

Re: शमा
ज़रा भुलक्कड़ है दिल ये भूल जाए अगर याद दिलाना हमें ये पानियों का शहर......
Re: शमा
पिघलते मोम से रिसता पानी जहां भी गिरता गया वो उस ज़मीन को तेरी ख्‍वाहिशों से भरता गया। ये पंक्तियां सबसे खूबसूरत हैं औऱ एक न पकड़ में आने वाले भाव को व्यक्त करने की मोहक अदा है लेकिन आपने जो फोटो दिया है वह अच्छा होने के बावजूद भी न जाने क्यों मुझे गैरजरूरी लगा क्योंकि आपकी कविता कल्पना को जो खुला आकाश देती है उसे यह फोटो किसी खास कल्पना में कैद करने की कोशिश करता हुआ लगता है। बहरहाल, अच्छी कविता के लिए बधाई।
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