वो भी बैचेनी में लिपटी अजीब सी सुबह का आगाज़ था
सूरज भी खुद को काले कंबल में लपेटा चुपचाप खड़ा था
दूर कहीं चांद भी आंसमा से उस रोशनी को ताक रहा था
गगन के तारे भी उस रोशनी के आगे फीके दिख रहे थे
धरती पर कहीं दूर बहती हुई नदी ने अपने भीतर
एक शमा को पानी की लौ से जला रखा था
पिघलते मोम से रिसता पानी जहां भी गिरता गया
वो उस ज़मीन को तेरी ख्वाहिशों से भरता गया।
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