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नीली नदी के तले....


वो परी अपने साथ मुझे
पानी की गहराइयों में कहीं
दूर तक ले जा रही थी
उसके हाथ को थामकर मैं
नीले जल में नीचे उतरती गई
तभी कुछ गरम सा एहसास हुआ
मैंने आंखे खोली तो दूर समंदर में
आग उबल रही थी कहीं
उस परी ने पास ले जाकर बताया
ये वही आग है..
जिसे तुमने अपने भीतर छुपा रखा है
वो प्‍यास जो जिस्‍मों को जला देती है
वो आंसू जो ज्‍वालामुखी का रूप बनते है
वो दर्द जिससे आँखे चीख उठती है
मैंने जब उससे इसका हल पूछा
तो उसने बड़े प्‍यार से कहा
तुम्‍हें इस आग से होकर जाना होगा
जैसे कोई शरीर जलकर मोक्ष को पाता है
वैसे ही
तुम्‍हारे अंदर की प्‍यास भी तृप्‍त हो जाएगी
तड़पती भटकन को ठिकाना मिल जाएगा
एक तलाश को उसकी जिंदगी मिल जाएगी
और इस समंदर की गर्म आग को भी
नीली नदी मिल जाएगी!

प्रतिक्रियाएँ

Re: नीली नदी के तले....
ये वो आग है जो राख नहीं करती, बल्कि सोना भी कुंदन बन जाता है .....
अस्वीकरण