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माफ़ी

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इस जहान से,
जिसकी मैं कभी हो न सकी
जहाँ का ख्‍वाब कभी मैं देख न सकी
जिसके असूलों पर कभी खरी उतर न सकी
जिसके दर्द मे अपने आँसू बहा न सकी
जिसकी ना पर,
मैं टूट कर धरती में समा न सकी
हाँ, मैं खुश हूँ अपने जहान में
जहाँ मेरा आसमां तो है।

प्रतिक्रियाएँ

Re: माफ़ी
अच्छा लगा पढ़कर! उम्दा सोच है!
अस्वीकरण